नोएडा

यूरीन जांच किट खरीद में बड़ा खेल? बाजार से चार गुना ज्यादा कीमत पर हुई खरीद

पीओ सिटी कंपनी पर लगा जिम्स प्रशासन के साथ खुलेआम धोखाधड़ी का आरोप; ₹1500 की किट ₹5340 में बेची, लंबे समय से चल रहा है खेल।

GIMS News : राजकीय आयुर्विज्ञान संस्थान (जिम्स) से एक बड़ा और आश्चर्यजनक स्कैंडल प्रकाश में आया है, जिसमें मरीजों की जेब और सरकारी खजाने पर खुलेआम हमला किया जा रहा है। जानकारी के अनुसार, जिम्स प्रशासन बाजार दर से लगभग चार गुना अधिक कीमत पर यूरीन जांच किट खरीद रहा है। संस्थान को इन महंगे उपकरणों और किट की आपूर्ति लंबे समय से ‘पीओ सिटी’ नाम की कंपनी द्वारा की जा रही है। आरोप है कि यह कंपनी जिम्स प्रशासन की नजरों के सामने पैथोलॉजी लैब में उपयोग होने वाले सामानों को अत्यधिक दामों पर बेचकर हर महीने संस्थान को लाखों रुपये का नुकसान पहुंचा रही है।

पैथोलॉजी लैब पर कंपनी का नियंत्रण

जिम्स मे चल रहे इस खेल की जड़ें काफी गहरी हैं। सूत्रों के अनुसार, पीओ सिटी कंपनी काफी समय से जिम्स की पैथोलॉजी लैब में लगभग सभी प्रकार की सुविधाएं प्रदान कर रही है। खून की जांच से लेकर यूरीन टेस्ट तक, हर  जांच का जिम्मा इसी के पास है। इसके अलावा, इन जांचों में इस्तेमाल होने वाली सभी मेडिकल किट भी यह कंपनी संस्थान को ऊंचे दामों पर बेचती है। लैब का सारा सामान और मशीनों के रीजेंट उपलब्ध कराने के साथ-साथ इस कंपनी ने लैब के भतर अपने लगभग 20 से 25 कर्मचारियों को भी काम पर रखा हुआ है, जिससे पूरी व्यवस्था पर इसे नियंत्रण मिला हुआ है।

₹1500 की किट, ₹5340 का बिल

इस पूरे घोटाले का एक ठोस सबूत और बिल भी सामने आया है, जो कंपनी द्वारा की जा रही धोखाधड़ी को दिखता  है। प्राप्त  जानकारी के अनुसार, 4 फरवरी को पीओ सिटी कंपनी ने जिम्स को यूरीन जांच के लिए उपयोग होने वाली ‘यूरीन स्कैन जेम 10 एसजीएल’ की 40 किट बेची। इस सौदे में कंपनी ने प्रति किट की कीमत ₹5,340 तय की, जिसके बदले में संस्थान को कुल ₹2,13,600 का भारी बिल प्रस्तुत किया गया। इसके विपरीत, चिकित्सा क्षेत्र और अन्य पैथोलॉजी लैब्स में किट सप्लाई करने वाली एक दूसरी प्रमुख कंपनी के वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि इस विशेष किट की असली कीमत सिर्फ ₹600 से ₹1,500 के बीच है।

विवादों के बावजूद डील जारी

बाजार के विशेषज्ञों और स्रोतों का  कहना है कि कंपनी केवल एक बार की यूरीन किट की आपूर्ति में सीधे लाखों रुपये का घोटाला कर रही है। यदि रक्त की अन्य जांचों और रीजेंट्स की लागत का ऑडिट किया जाए, तो यह धोखाधड़ी करोड़ों रुपये तक पहुँच सकती है। इस खुली लूट और गंभीर आरोपों के बावजूद जिम्स प्रशासन द्वारा इस ब्लैकलिस्टेड जैसी कार्यप्रणाली वाली कंपनी के साथ समझौते को जारी रखना कई महत्वपूर्ण सवाल उठाता है। वर्तमान में इस मुद्दे के सामने आने के बाद संस्थान में हड़कंप मच गया है और निष्पक्ष जांच की मांग बढ़ने लगी है।

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